नेगी

उत्तराखण्ड की काव्य सृजना धरा पर वैसे तो अनेक रचनाकारों ने जन्म लिया। यहाँ एक से बढ़कर एक महान लोक गायक हुए है, परन्तु नेगी दा के नाम से विख्यात नरेंद्र सिंह नेगी पहाडी लोक संगीत में एक अलग पहचान रखते है। निसंदेह नेगी दा उत्तराखण्ड की लोक संस्कृति के ध्वजवाहक हैं। वे पहाड़ की बहू-बेटी के प्रतिनिधि हैं तो व्यथा के प्रतिबिम्ब भी हैं। पहाड़ की पहाड़ जैसी समस्याओं के युगदृष्टा हैं। और अपने समय में तेजी से आ रहे बदलावों, लोगों के सरोकारों तथा जनजीवन के चितेरे भी हैं। वे कवि हैं, गीतकार हैं, लोकगायक हैं, और साथ ही चिंतक भी है। एक व्यक्तित्व में इतने गुण समाहित होना यदा कदा ही होता है।

जब दुनिया से हजारों बोली-भाषाएं लुप्त होती जा रही हैं तो ऐसे दौर में उत्तराखण्ड की प्रमुख बोली को न सिर्फ पुनर्स्थापित करने बल्कि उसे लोक भाषा का सिरमौर बनाने की मंशा रखने वाले नरेन्द्र सिंह नेगी लोकमानस के पुरोधा भी हैं। वे उत्तराखण्ड के एकमात्र ऐसे लोक गीतकार हैं जो अस्कोट से आराकोट तथा हरिद्वार से बदरीनाथ तक समान रूप से लोकसमाज में प्रतिष्ठापित हैं। हाल के वर्षों में लोकभाषा के उन्नयन के लिए उन्होंने जो अप्रतिम योगदान दिया, उसे सत्ता प्रतिष्ठान से बेशक महसूस न किया गया हो, लेकिन लोकसमाज ने जरुर अंगीकृत किया है और शिद्दत के साथ उनकी बात को सुना भी जा रहा है।

ऐसे लोग बिरले ही होते हैं। कहना गलत न होगा कि समूचे उत्तराखंडी समाज के लिए नरेंद्र सिंह नेगी आईना हैं। उनकी रचनाओं में हमें हमारा अक्स नजर आता है। वे समाज के दिग्दर्शन भी हैं। बुराईयों को त्यागने की अलख भी जगाते हैं, पर्यावरण संरक्षण की धुन छेड़ते हैं जो उनके इस गीत “ना काटा तौं डाल्युं, तौं डाल्युं ना काटा भुलौं..” से साफ़ झलकता है। कभी पहाड़ की नारी की व्यथा को अपने गीतों “कभी सीला पाखौं रीटू, कभी तैला घाम…” तथा  “सौणा का मैना ब्वे कनुकै रैणा” के जरिये समाज तक पहुचाने का काम करते हैं। वहीँ जिन्दगी की राह में शौर्टकट अपनाने वाले आजकल के युवाओं के लिए उनका एक गीत “न दौड़ न दौड़ तै उन्दरी का बाटा, उन्दारी का बाटा, सौन्गु चितेन्द अर दौड़े भि जान्द पर…” बहुत प्रेरणादायक है। पलायन को लेकर नेगी दा कभी खाली हो रहे पहाड़ के भावी परिणामों के प्रति आगाह करते हैं तो वहीँ एक बड़े भाई की तरह स्नेहभरी डांट भी पिलाते हैं।

इसके अलावा माँ नन्दा देवी राजजात पर उनकी मधुर आवाज में गाया सुप्रसिद्ध माँ भगवती गीत “जै बोला जै भगोती नन्दा, नन्दा ऊँचा कैलाश की…” कौन भूल सकता है। ऐसे सैकड़ों उदाहरण है जो उनकी रचनाओं एवं गीतों के जरिए उत्तराखंडी समाज के लिए आईना बने हैं। कहना गलत नहीं होगा कि नेगी दा उत्तराखण्ड के रचनाकारों के मेरुदंड की तरह हैं। नेगी जी सिर्फ एक मनोरंजनकर्ता ही नहीं बल्कि एक कलाकार, संगीतकार और चितेरे कवि हैं जो अपने पारम्परिक परिवेश की दशा और दिशा को लेकर काफी भावुक एवं संवेदनशील हैं।

अगर आप उत्तराखण्ड और वहां के लोगों, समाज, जीवनशैली, संस्कृति, राजनीति आदि को जानना-समझना चाहते हैं, तो फिर या तो एक लंबा अर्सा यहाँ बिताकर “भारत के भाल” इस विशिष्ट भूभाग के बारे में सम्पूर्ण जानकारी बटोर लो या फिर केवल गढ़रत्न नेगी दा के गीत सुन लो। तब शायद आपको उत्तराखण्ड की संस्कृति एव समाज के बारे में जानने के लिए किसी यूनिवर्सिटी में दाखिला नहीं लेना पड़ेगा। निसंदेह नेगी दा महज एक व्यक्ति नहीं बल्कि संस्थान हैं। वे भाषा आंदोलन का भी बड़ा नाम हैं।

नेगी जी का जन्म 12 अगस्त 1949 में पौड़ी जिले के पौड़ी गांव में हुआ। उन्होंने गायन-वादन विधा की शुरुआत पौड़ी की रामलीला से की थी और अब तक वे दुनियाभर के कई देशों मे पहाड़ी संगीत की प्रस्तुति दे चुके हैं। नेगी जी की रचनाएं क्वालिटी की गारंटी होती हैं, इसीलिए लोग उन्हें गौर से न सिर्फ सुनते हैं बल्कि एक नजीर मान कर चलते हैं। यांत्रिक युग में जिस कालखंड में गिनती के रचनाकारों को जाना जाता था, उस दौर में नेगी जी का लोकसंगीत के क्षितिज पर प्रकट होना किसी चमत्कार से कम नहीं है।

नेगी जी के आने के बाद नये लोगों के लिए रास्ते खुले। यह अलग बात है कि उस कोलाहल में कुछ स्वर कुंद हुए तो कुछ उभरे भी। लेकिन जो बड़ी लकीर नेगी जी खींच चुके हैं, उसकी बराबरी शायद ही कोई कर सके। जनसरोकारों को अपनी लेखनी से उकेर कर गीत के माध्यम से लोक को लौटाने का जो तरीका उन्होंने सिखाया, उसकी बराबरी कोई नहीं कर सकता। इसी कारण पूरा उत्तराखण्ड उनके पुराने गीतों को भी आज भी उसी प्यार और सम्मान के साथ सुनता है। नेगी जी के गानों में अहम बात है, उनके गानों का शब्द चयन। उन्होंने अपने गीतों के माध्यम से उत्तराखण्डी लोकमानस के सभी दुख-दर्द, खुशी एवं जीवन के पहलुओं का बारीकी से वर्णन किया है।

ऐसा नहीं है कि नेगी जी केवल उत्तराखण्ड में रह रहे लोगों के बीच ही प्रसिद्ध हैं बल्कि वे देश के विभिन्न भागों में रह रहे अपने लोगों के साथ ही सात समंदर पार भी अपनी माटी की खुश्बू बिखरने के सिद्धहस्त कलाकार हैं। इसी कारण उन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है।

नेगी दा ने कई पहाड़ी फिल्मों में भी अपनी आवाज दी है जैसे कि ‘चक्रचाल’ ‘घरजवाई’, ‘मेरी गंगा होलि त मैमा आलि’ आदि। अब तक नेगी जी एक हजार से भी अधिक गाने गा चुके हैं। दुनियाभर में उन्हें कई बार अलग अलग अवसरों पर पुरस्कृत किया जा चुका है। एक समय में आकाशवाणी लखनऊ से सबसे ज्यादा मांग उनके गाने सुनने की रहती थी।

नेगी जी केवल वास्तविकता में विश्वास रखते हैं। इसीलिए उनके सभी गाने यथार्थ के धरातल पर होते हैं। उनमे भावनाओं का ज्वार होता है और उस आवेग को नियंत्रित करने वाला संवेग भी। इसी कारण नेगी जी के गीत उत्तराखण्ड के लोगों के दिल के बहुत करीब होते हैं। अब तक नेगी जी की तीन पुस्तकें क्रमश: ‘खुच कंडी’, ‘गाणियों की गंगा, स्याणियों का समोदर’ और “मुट्ट बोटिक रख” प्रकाशित हो चुकी हैं। नेगी जी की संवेदनशीलता देखिये कि जब कुछ सालों पहले टिहरी बांध की खातिर टिहरी नगर को पानी में डुबोया जा रहा था, तब नेगी जी ने एक गीत लिखा और गाया “अबारी दां तू लम्बी छुट्टी ले की ऐई, टिहरी डूबण लग्युं चा बेटा डाम का खातीर…” तो वह कालजयी रचना हो गई।

इसी तरह उत्तराखण्ड जब आंदोलन चला तो हर उत्तराखंडी को प्रेरित करने वाला ‘आंदोलन गीत’ भी उनकी लेखनी से फूटा और उन्होंने तमाम उत्तराखंडियों को पृथक राज्य आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए प्रेरित किया। वह भी तब जब वे खुद सरकारी सेवक थे। इतना बड़ा जोखिम कोई उठाता है तो उसकी दाद तो देनी ही पड़ेगी।

वर्तमान में नेगी जी देहरादून में रह रहे हैं। इस साल उनका “होरी ऐगे” गीत भी काफी चर्चित रहा है। और हाल ही में उनके शुरूआती दौर में लिखे गीत “बरखा झुकी ऐगे” का वीडियो यूट्यूब की जारी हुआ है। जो कुछ ही समय में लाखों लोगों द्वारा देखा जा चुका है। स्वास्थ्य थोड़ा नाजुक होने के बावजूद वे अपनी रचनाशीलता में व्यस्त हैं।

पिछले कुछ समय से नेगी जी के बारे में सोशल मीडिया पर लगातार गलत और भ्रामक खबर फैलाई जा रही हैं। यह समझ से परे है कि आखिर ऐसे महान इंसान के लिए ऐसा नकारत्मक लिखकर किसी को क्या मिल सकता है। खैर इन सब से कोई फर्क नहीं पड़ता है क्योंकि ये नकारत्मक सोचे वाले केवल इक्का-दुक्का ही लोग हैं, और उनके चाहने वाले लाखों लोग हैं। करीब 30 ऑडियो कैसेट, छह से अधिक फिल्मों को संगीत देने के साथ गीतकार तथा पाश्र्वगायन में योगदान देने के साथ ही हजारों प्रस्तुतियां देने के कारण नेगी जी उत्तराखंडियों के लिए एक जीवंत किंवदंति बन गये हैं। उनके शतायु होने की स्वाभाविक रूप से कामना की जाती है।

पहाड़ों से पलायन के बारे नरेंद्र सिंह नेगी जी की सोच क्या है इस बारे में उनके इंटरव्यू का एक विडियो मुझे यूटयूब पर देखने को मिला जिसे मैं आप लोगों के लिए शेयर कर रखा हूँ।

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