kali-mandir

उत्तराखंड के गढ़वाल व कुमाऊं क्षेत्र के दशोली ब्लॉक में स्थित है। शक्ति पीठ महाकाली मंदिर। इस स्थान को लोग माँ कालिंका के नाम से भी जानते हैं। भगवती कालिंका स्थानीय लोगों में बहुत अधिक पूज्यनीय है और इनका मंदिर धार्मिक व सामाजिक आयोजनों के लिए बहुत ही महत्व रखता है। मंदिर सदियों से अस्तित्व में है लेकिन पिछले एक दशक में इसका नवीनीकरण किया गया है। यह बुरांश, बांज, चीड़, देवदार से घिरा और यहां से दूधातोली पहाड़ियों, त्रिशूल मासिफ़ का सुदर दृश्य दिखाई देता है, जो मन को मोह लेता है।

प्रचलित मान्यता के अनुसार जब गढ़वाल कुमाऊं पर गोरखों का आधिपत्य हो गया तो उन्होंने गढ़ कुमाऊं के जनमानस पर बहुत अत्याचार किए। तब लोग अपने घर बार छोड़कर जंगलों में छिप गए थे। इसी दौरान ललित सिंह बड़ियारी (पूज्य लैली बूबा जी) भी अपने घर व परिजनों से बिछड़कर जंगलों में भटकते भटकते बच्चों संग पाखापाणी पहुंच गए थे। वहां पर उन्होंने चट्टान को काटकर एक गुफा तैयार की। जो कि आज भी लैली उड़्यार के नाम से विख्यात है। बाद में पूज्य लैली बूबा जी ने बन्दरकोट में अपना घर बनाया फिर कुछ दिनों बाद गढ़वाल कुमाऊं के दोशान में भगवती कालिंका के मंदिर की स्थापना की। लैली बूबा के निधन के बाद उनके वंशज पूज्य आत्मा की शांति एवं अपनी मनोकामना के लिए मंगशीर महीने के शुक्ल पक्ष में हर तीसरे वर्ष कुल पंडितों मंमगाइयों के द्वारा मां कालिंका की विधि विधान के साथ पूजा अर्चना करते हैं।

इस वर्ष मां कालिंका के महाकाली मंदिर में त्रैवार्षिक महाकाली यात्रा का आयोजन 2 दिसंबर से प्रारंभ हो रहा है जो कि बड़ियारी कुल के सभी गांवों की परिक्रमा करने के बाद 13 दिसंबर को शक्ति पीठ क्वाठा में भीतरी कौथिक होने के बाद 14 दिसंबर सुबह को भगवती न्याज़ा महाकाली मंदिर प्रांगण में शाम तक लग्नानुसार रहेगी। जात्रा में सभी श्रद्धालुओं का स्वागत है।

रिपोर्ट द्वारिका चमोली

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