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चमोली जिला मुख्यालय, गोपेश्वर से 13 किलोमीटर दूर मण्डल घाटी में प्रतिवर्ष दत्तात्रेय जयन्ती पर लगने वाला प्रसिद्ध धार्मिक दत्तात्रेय मां सती अनसूया मेला इस वर्ष 11 व 12 दिसंबर को आयोजित होगा। संतानदायिनी माता अनसूया का यह मेला इस बार कुछ खास है, 46 साल के बाद माता अनुसुया की देव डोली भ्रमण पर अपने क्षेत्र से बाहर गई हुई हैं और दत्तात्रेय जयंती को वापिस मण्डल घाटी में आगमन होना है। नौ अक्तूबर से माता अनसूया की दिवारा यात्रा शुरू हुई थी। केदारनाथ और बदरीनाथ धाम के दर्शन करने के बाद पिछले डेढ़ माह से माता की डोली विभिन्न गांवों का भ्रमण कर अपनी ध्याणियों और भक्तों की कुशलक्षेम पूछ रही है। मंडल घाटी के नौ गांवों की आराध्य देवी माता अनसूया 11 व 12 दिसंबर को अनसूया मेले के लिए अपने मंदिर में पहुंच जाएगी।

मुख्य सड़क मार्ग से करीब 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित माता का यह पावन स्थल अत्यंत रमणीय तथा मन को शांति पहुंचाने वाला है। मंदिर से 1.5 किमी की दूरी पर अमृतगंगा पर शोभनीय झरना है, जिसकी परिक्रमा की जा सकती है। यहां भी प्रकृति का मनमोहक नज़ारा दिखाई देता है और महसूस होता है कि हमारे पूर्वज, ऋषि-मुनि इन कंदराओं में, गुफाओं में क्यों साधना हेतु आया करते थे।

कहा जाता है जब अत्रि मुनि यहां से कुछ ही दूरी पर तपस्या कर रहे थे तो उनकी पत्नी अनसूया ने पतिव्रत धर्म का पालन करते हुए इस स्थान पर अपना निवास बनाया था। किंवदती है कि, देवी अनसूया की महिमा जब तीनों लोकों में गाए जाने लगी तो अनसूया के पतिव्रत धर्म की परीक्षा लेने के लिए पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती ने ब्रह्मा, विष्णु और महेश को विवश कर दिया। पौराणिक कथा के अनुसार तब ये त्रिदेव देवी अनसूया की परीक्षा लेने साधुवेश में उनके आश्रम पहुँचें और उन्होंने भोजन की इच्छा प्रकट की। लेकिन उन्होंने अनुसूइया के सामने शर्त रखी कि वह उन्हें गोद में बैठाकर ऊपर से निर्वस्त्र होकर आलिंगन के साथ भोजन कराएंगी। इस पर अनसूया संशय में पड़ गई। उन्होंने आंखें बंद कर अपने पति का स्मरण किया तो सामने खड़े साधुओं के रूप में उन्हें ब्रह्मा, विष्णु और महेश खड़े दिखाई दिए। अनुसूइया ने मन ही मन अपने पति का स्मरण किया और त्रिदेव छह महीने के शिशु बन गए। तब माता अनसूया ने त्रिदेवों को उनकी शर्त के अनुरूप ही भोजन कराया। इस प्रकार त्रिदेव बाल्यरूप का आनंद लेने लगे। उधर तीनों देवियां पतियों के वियोग में दुखी हो गई। तब नारद मुनि के कहने पर वे अनसूया के समक्ष अपने पतियों को मूल रूप में लाने की प्रार्थना करने लगीं। अपने सतीत्व के बल पर अनसूया ने तीनों देवों को फिर से पूर्व रूप में ला दिया। तभी से वह मां सती अनसूया के नाम से प्रसिद्ध हुई।

त्रिदेव को अपने सतीत्व के योग बल पर बालक बनाने वाली देवी, त्रिदेवियों के घमंड का नाश करने वाली भगवती, अपने चौखट पर आयी हुई निसंतान दंपतियों को संतान सुख का आशीर्वाद देने के लिए चारों दिशाओं में पूजनीय हैं। संतान कामना के लिये निसंतान दम्पति इस पर्व पर मां अनसूया के दरबार में पहुंचते हैं। भारत के विभिन्न कोनों से मां अनसूया के दरबार में निसंतान दम्पति पूजा-अर्चना करते हैं। कहा जाता है कि मां अनसूया की ही कृपा और श्रद्धालुओं की आस्था है कि आज तक कोई मां के दरबार से खाली नहीं लौटा।

वैसे तो यहां साल भर आया जा सकता है लेकिन इस दिन का विशेष महत्व होने से बहुत दूर दूर से लोग अपनी मनोकामना ले कर पहुंचते हैं। इस 11 एवं 12 दिसंबर को आप भी अपने परिवार व प्रियजनों के साथ इस शुभ दिन के साक्षी बने। देवभूमि संवाद के लिए बद्रीश छाबड़ा की रिपोर्ट

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